Nawada, Rabindra Nath Bhaiya: भारतीय संस्कृति में शीतल जल का महत्व है। खासकर गंगा जल कभी अमृत माना गया है। माना तो यह भी जाता है कि मानव संस्कृति के लिए नदियां वरदान है। मानव सभ्यता के विकास यात्रा का प्रथम रास्ता नदियों के सहारे आगे बढ़ा है। पर्वत राज हिमालय भारतीय संस्कृति के मूक भी हैं और हिम से भरे पर्वत राज की कोख में असीमित जल राशि का भंडार नदियों में भरा पड़ा है। आर्य जाति को हिमालय ने बहुत कुछ प्रदान किया है। गंगा तो हिमालय द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण उपहार है जिसके आस-पास में आर्य जातियों ने जीवन का मार्ग जाना था और जाना था कई प्रकार के भोज्य पदार्थों को भी।

वैदिक साहित्य में गंगा की चर्चा कम है लेकिन काव्य साहित्य और पुराणों में गंगा की चर्चा है। भौतिक दृष्टि से प्रतीत होता है कि आर्यों ने ही आगे चलकर खासकर त्रेता में या तो गंगा को खोदा या गंगा की जानकारी हुई। ब्राह्मण साहित्य खासकर शतपथ ब्राह्मण बाद में प्रकाश में आया, वायुपुराण में भारत वर्ष के पर्वतों और नदियों की चर्चा बार-बार की गयी है।
वायुपुराण के जम्बुद्वीप के वर्णन के क्रम में सूत जी के अनुसार दक्षिण और उत्तर में कैलाश और हिमवान नाम के पर्वत है, जो पूरब से पश्चिम तक फैले हुए हैं और दोनों ओर समुद्र में प्रविष्ट हैं जिस कारण उस पर्वत श्रेष्ठ के एक गण्ड देश से जम्बू नाम की नदी यह निकली है, जिसमें नघुतुल्य रस प्रवाहित रहता है, दक्षिण दिग्वर्ती पर्वत राज गन्धमान पर जो नदी उतरती है, वह विभिन्न प्रपातों और अनेक तरंग मालायुक्त जल प्रवाह करती हुई देवराज के इन्द्र नन्दनवन को सींचती है एवं गन्धमान की प्रदक्षिणा करती हुई चलती है। सभी लोग उसे अलकनन्दा कहते हैं । यह महानदी हजारों शैलों को फाड़ती हुई, सैकड़ों स्थलों को सींचती हुई, हजारों वनों को और सैकड़ों कन्दराओं को भिगोती हुई तीव्र वेग में दक्षिण समुद्र में गिरती है। जो रम्य नदी योजन परिमित चौड़ी और शैलकुक्षि में घिरी हुई है, महात्मा देवाधिदेव शंकर ने जिसको अपने सिर पर धारण किया है, वह घोर पापियों को भी पवित्र करने वाली है, यह महानदी गंगा है।
आगे सूत जी कहते हैं कि ब्राह्मणों ,यह हिमालय पर्वत के चारों ओर से निकलकर अनेक शाखाओं में विभक्त हो गयी है जो भिन्न-भिन्न नामों से प्रसिद्ध है। यह महानदी गंगा नाम से प्रसिद्ध है, जो सिद्धों से सेवित है । जिन देशों के बीच से होकर यह रुद्र, साध्य, वायु और आदित्य से सेवित यशस्विनी गंगा प्रवाहित होती है, वह देश श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत के अनुसार अयोध्या के राजा सगर जो चक्रवर्ती सम्राट थे । उनके पुत्रों ने पृथ्वी को खोदकर समुद्र बना दिया था। सगर के पुत्र अंशुमान हुए। अंशुमान के पुत्र दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए । सगर के पुत्र अंशुमान और दिलीप ने धरती पर गंगा को लाने का प्रयास किया लेकिन दोनों असफल हो गये।
मार्कण्डेय पुराण के रचयिता मार्कण्डेय जी कहते हैं- विश्वयोनि भगवान नारायण जो धवाधर (शिशु मार चक्र) नामक पद है, उसी के त्रिपथगामिनी भगवती गंगा का प्रार्दुभाव हुआ है। वहाँ से चलकर जल के आधारभूत चन्द्र मण्डल में प्रविशिष्ट हुई, और सूर्य की किरणों के सम्पर्क से अत्यन्त पवित्र हो मेरु पर्वत के शिखर पर गिरी, वहाँ उनकी चार धाराएँ हो गयीं और आधार नहीं होने के कारण नीचे गिरने लगीं। और कई पर्वतों को लांघती गंगा हिमवान पर जा पहुँची। हिमवान पर्वत पर भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटा में बांध लिया। आगे वेगवान गंगा राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर पूरब दिशा में समुद्र में मिल गयी उपर्युक्त वर्णनों में गंगा के भौतिक स्थिति के साथ शंकर के जटा में • हिमवान पर्वत पर बांधने और घोड़े की खोज में गंगा सागर के मिलन स्थान पर कपिल मुनि के क्रोध से सगर राजा के साठ हजार पुत्रों के स्वर्गसिधारने की घटना पर विद्वानों में मतभेद है।
पुराणों के अनुसार सदा शिव शंकर दानवों या राक्षसों को सहारा देकर बलवान बनाते थे, इस कारण दानव, मानवो खासकर आर्यों को तंग करते थे, इस पृष्टभूमि में यह मानने की स्थिति बनती है कि संभव है कि शिवभक्तों ने गंगा को हिमालय की परिधि में बांध रखा हो जो भौतिक रूप से जी के अनुसार हिमालय पर्वत के चारों ओर से निकलकर अनेक शाखाओं में विभक्त हो गयी है। जो सुत भिन्न-भिन्न नामों से प्रसिद्ध है, सही जान पड़ता है। इस पूरे क्षेत्र की गंगा को अलकनन्दा कहा जाता है।
वर्तमान में कई चिंतक मानते हैं कि गंगा लाने में भगीरथ राजा के सेनाओं से शिवभक्तों का संघर्ष हुआ हो। जहाँ तक कपिल मुनि के क्रोध से सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म होने का वृतांत है, इस पर श्रीमद भागवत पुराण के नवम स्कन्ध में शुकदेव जी परीक्षित से कहते हैं। सगर के लड़के कपिलमुनि के क्रोध से जल गये, ऐसा कहना उचित नहीं है। वे तो शुद्ध सर्वगुण के परम आश्रय हैं, उनका शरीर तो जगत को पवित्र करता रहता है। उसमें भला, क्रोध रूप और तपोगुण की संभावना कैसे की जा सकती है।
गंगा अवतरण की कथा से स्पष्ट है कि गंगा की खुदाई अंशुगन ने हिमालय के तलहटी से प्रयाग राज, जहाँ तीन नदियों का संगम है तक किया, और वे स्वर्गवासी हो गये फिर उनके पुत्र दिलीप जिनकी शादी मगध देश की विदुषी कन्या सुदक्षिणा से हुई थी ने प्रयाग से लेकर काशी और आगे अजगैवी नाथ मन्दिर के बीच कराया, जहाँ राजा जहु का निवास था।
वायु पुराण अध्याय 91 के अनुसार राजा सुहोत्र के पुत्र राजा जहु परम दयालु और याचकों को मनचाहा दान देते थे, ने यज्ञ की सामग्री को गंगा द्वारा प्लावित करते देखकर, तब क्रोध में भावावेश में हे गंगे इस घमंड का फल तुम्हारे जलराशि पीकर मैं व्यर्थ कर देता हूँ। तब सभी ऋषियों ने राजा जहू को गंगा को कन्या के रूप में उपहार स्वरूप प्रदान किया। तब से गंगा का एक नाम जाह्नवी पड़ा। पूर्वोक्त वैदिक मंत्रों से इन पौराणिक वर्णनों का सम्बंध लगाने पर यह हो जाता है कि हमारे पूर्वज महर्षियों की खोज कितनी गहरी थी। वे गंगाजल के असाधारण गुण देखते हुए भी वर्फ का जल या हिमालय की औषधियों का धोवन कहकर संतोष नहीं कर लेते थे।
पूर्वजों ने इस गंगा जल की असलियत खोज निकाली थी और इसे अलौकिक दिव्य जल माना था। तभी श्रीमद्भागवत के वचन में इसमें स्नान करने वाले के पद-पद में अश्वमेध, राजसूय आदि का फल बताया गया है। सांस्कृतिक इतिहास में भागीरथी गंगा का विस्तार से वर्णन उपलब्ध है यह गंगा हिमालय पर्वत से निकालकर सुल्तानगंज नामक स्थान तक भागीरथी गंगा के नाम से प्रसिद्ध है और जहांगरा नामक स्थान से आगे की गंगा को जाह्नवी गंगा कहा जाता है मानता है कि राजा सोहोत्र के पुत्र जहू तपस्वी राजा थे। इस स्थान पर गंगा नदी के बीच में एक छोटे पर्वत पर जहान्वी ऋषि का मंदिर भी है।
21 वीं शताब्दी के 22 साल में बिहार सरकार के जोरदार एवं ईमानदार प्रयास से मोकामा के हथदह के पास से उद्भव प्रणाली के द्वारा गंगाजल अब मगध के प्राचीन राजनगर राजगीर जिसकी चर्चा रामायण महाभारत के अलावे भागवत पुराण और वायु पुराण में विस्तार से किया गया है इस राजनगर को बसाने वाले राजा बसु थे इस कारण इसके 5 नामों में प्रथम नाम वसुमति है गंगाजल राजगीर के सांस्कृतिक कुतूहल पूर्ण इतिहास में आस्था का अमृत समान माना जा रहा है। इस उधवा प्रणाली से शीतल गंगाजल राजगीर से आगे गया जिसे लोग गया जी कहते हैं।
माना जाता है कि भगवान विष्णु के पद नमस्कार करने मात्र से व्यक्ति परम ब्रम्ह को प्राप्त करता है उस स्थान पर फल्गु नदी प्रवाहित है। माना जाता है सीता जी के श्राप से फल्गु में सालों भर जल नहीं रहता लेकिन अब फल्गु में सालों भर गंगाजल उपलब्ध रहेगा इसके आगे ज्ञान के नगरी बोधगया भी गंगाजल पहुंच गया है। 28 नवंबर 2022 का दिन यादगार रहेगा कारण इस दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जय-जय भागीरथी नंदिनी मनुष्य चकोर चांदनी के मंत्र के साथ जल अर्पण किया है सही में यह गंगा जो पटना जिला से निकलकर नालंदा नवादा से आगे गया जिला तक पहुंची है यह मागधी गंगा है इस कारण इस गंगा को बार-बार नमस्कार है।
आलेख:-राम रतन प्रसाद सिंह रत्नाकर